देखो कोई ग़ज़ल दाख़िल हो गई शायद / Dekho koi Gazal daaKHil ho gyi shayad

whiskey poetry

देखो कोई ग़ज़ल दाख़िल हो गई शायद,
ज़ेहन1 को बर्दाश्त मुश्किल हो गई शायद |

लिखने तो बैठे थे खुशी का पैग़ाम उसे,
संगीन2 ही कोई बात नाज़िल3 हो गई शायद |

क्या हुआ वो कई दिनों से मुस्कुराई नहीं,
वो भी किसी की बिस्मिल4 हो गई शायद |

ख़्वाब में तो बस दो पल ही दीदार हुए,
उसी से तबीयत ख़ुश-दिल5 हो गई शायद |

अब वो दूर कुछ कम बैठने लगीं हैं,
मेरी नीयत इस क़ाबिल हो गई शायद |

लिखूँ तो हर्फ़-ए-लहू6 लिखता हूँ मैं,
ये कलम ही मेरी क़ातिल हो गई शायद |

नींद भी अब ख्वाबों से कतराने लगी,
तजरबों7 से इतनी फ़ाज़िल8 हो गई शायद |

अब ये पैर थकने कम लगें हैं ‘चौधरी’,
ये राह ही अब मंज़िल हो गई शायद ||

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Dekho koi Gazal daaKHil ho gyi shayad,
Zehn1 ko bardaasht mushkil go gyi shayad |

Likhne to baithe the KHushi ka paiGaam usse,
sa.ngiin2 hi koi baat naazil3 ho gyi shayad |

Kya hua vo kai diino.n se muskurayi nahi.n,
Vo bhi kisi ki bismil4 ho gyi shayad |

KHvaab mai to bas do pal hii diidar huae,
Ussi se tabiiyat KHush-dil5 ho gyi shayad |

Ab vo durr kuch kam baithne lagi.n hain,
Meri niiyat iss qaabil ho gyi shayad |

Likhuu.n to harf-e-lahuu6 likhta hun mai,
Ye kalm hi meri qaatil ho gyi shayad |

Neend bhi ab KHvaabo.n se katraane lagi,
Tajrabo.n7 se itni faazil8 ho gyi shayad |

Ab ye paiir thakne kam lage.n hain ‘Chaudhary’,
Ye raah hii ab manzil ho gyi shayad ||


(1* mind)
(2* serious/ severe/ intense)
(3* descending, arriving at)
(4* lover, afflicted lover)
(5* Jollity, Lively)
(6* words of blood)
(7* experiences)
(8* accomplished, proficient)

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ख़ुद हूँ बर्बाद इस कदर / KHud hun barbaad iss kadar

Jaun 2
ख़ुद हूँ बर्बाद इस कदर किसको हिदायत1 क्या करूँ
ना वो मेरे ना उनका ख़ुदा किससे शिकायत क्या करूँ

कुफ़्र1.5 में कटे है दिन सारे कुछ मय-कशी2 कुछ दिल्लगी
अभी दो घड़ी मुस्कराए थे आ गई क़यामत क्या करूँ

ना जलने की तमन्ना ना डूबने की ख्वाहिश थी कोई
यूँ तो बुज़दिल दिल थे हम हो गई मोहब्बत क्या करूँ

ना करूँ दुआ इलाज़ की ना कोई सज्दा3 सुकून के लिये
मांगु तो उनकी खुशी इससे बढ़कर इबादत4 क्या करूँ

कहतें हैं वो यूँ झूठ ना कहो कुछ नही बस लिखते तो हो
ख़ुद ही पे तेज़ाब लिपते हैं हम अब और हिमाक़त5 क्या करूँ

वादा था शरीफ़ रहने का मौजूद-ओ-मयस्सर6 रहने का
मदहोश हुए गुम-सूम थे हम हो गई शरारत क्या करूँ

यूँ बैठ झुंझलाते तपते रहें लिखते रहें जगतें रहें
हैं तो दरिया-दिल भी हम पर ख़ुदपर भी इनायत7 क्या करूँ ||

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KHud hun barbaad iss kadar kisko hidaayat1 kya karun
Na vo mere na unka KHuda kisse shikaayat kya karun

Kufr mai kate hai din saare kuch may-kashi2 kuch dillagi
Abhi do ghadi muskuraye the aa gai Kayaamat kya karun

Na jalne ki tamanna na duubne ki KHvaahish thi koi
Yun to buzdil dil the hum ho gayi mohabbat kya karun

Na karun dua ilaaz ki na koi saZda3 sukun ke liye
Mangu to unki khushi iss.se badhkar ibaadat4 kya karun

Kehtain hain vo yun jhuth na kaho kuch nahi bas likhte to ho
KHud hi pe tezaab lipte hain hum aur koi himaakat5 kya karun

Vada tha shariif rehne ka maujuud-o-mayassar6 rehne ka
Madhosh hue guum-suum the hum ho gai sharrarat kya karun

Yun baith jhunjhalate tapte rahen likhte rahen jagten rahen
Hain to dariya-dil bhi hum par KHudpar bhi inaayat7 kya karun ||

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(*1-रास्ता दिखाना; अनुदेश; guidance)
(*1.5-पाप; कृतध्नता; heathenism)
(*2-शराब पीना; boozing)
(*3-सर झुकाना; bowing in prayer)
(*4-पूजा; prayer)
(*5-बेवकूफ़ी; मूर्खता; foolishness; madness)
(*6-प्राप्त; लब्ध; present and available)
(*7-दया; मेहरबानी; favour; kindness)

Pic- Jaun Elia

सुन! आज मै सारी रात इन्तज़ार में था / Suun! Aaj main saari raat intzaar mai tha

waiting

सुन! आज मै सारी रात इन्तज़ार में था
चंद अल्फाज़ों के लिए दिल कतार में था
वोही पुरानी आदत लोट आई फिर से
हर समझ को नकार दिल इंकार में था

समझाया! खेल था दो पल का चहकता क्यूँ है
ना वादा था ना कोई करार बहकता क्यूँ है
ना होगी बरसात उनके अशआ’रों की आज
जल जायेगा पगले यूँ दहकता क्यूँ है

सुन! आज कई रातो बाद नींद नही आई
सुकून पाने ज़ेहन ख्वाबों के बाज़ार में था
जगता रहा रातभर कुछ ना ख़रीदा उसने
बेअसर रहा हर नुस्खा जो इस्तेहार में था

बह्लाया! और भी हसीन है सो जा प्यारे
कहेंगे वो भी यही कहीं और खो जा प्यारे
नासमझ नहीं हैं वो शक है गहरा उनको
अंगारे है इस राह कहीं और हो जा प्यारे

ज़िद्दी, ना जाने किस चीज के ऐतबार में था
उनके या उनके साये के गहरे प्यार में था
सुन! आज मै सारी रात इन्तज़ार में था
चंद अल्फाज़ों के लिए दिल कतार में था ||


Suun! Aaj main sari raat intzaar mai tha
Chand alfaazon ke liye dil kataar mai tha
Vohi purani aadat lout aai fir se
Har samajh ko nakar dil inkaar mai tha

Samjhaya! Khel tha do pal ka chehkta kyun hai
Na vada tha na koi karar behekta kyun hai
Na hogi barsaat unke ash.aaron ki aaj
Jal jayega pagle yun dehekta kyunn hai

Suun! Aaj kai raaton baad neend nahi aai
Sukun paane zehen khwaboon ke baazar mai tha
Jagta raha raat bhar kuch na khareeda usne
Be.asar raha has nuskha jo istehaar mai tha

Behelaya! Aur bhi haseen hai soo ja pyaare
Kahenge vo bhi yahin kahin aur kho ja pyaare
Nasamjh nahin hai vo shakk hai gehera unko
Angarre hai iss raah kahin aur ho ja pyaare

Ziddi, na jaane kis cheez ke aitbaar mai tha
Unke ya unke saaye ke gehre pyaar mai tha
Suun! Aaj main saari raat intzaar mai tha
Chand alfaazon ke liye dil kataar mai tha

ख़ुद को रोकते हैं कह कर ये / Khud ko rokte hain keh kr ye

peer-parvat-si

ख़ुद को रोकते हैं कह कर ये के वो ना यूँ मचल रहा होगा,
आख़िर क्यू करें परेशान उसे वो यूँ कर रहा होगा यूँ कर रहा होगा |

इकलौते हम ही एक दीप नही जो रोशन करे अंधेरों को,
जैसे जलते हैं हम मे वो उनमे क्या पता कोई जल रहा होगा |

ख़ुद को रोकते हैं कि बहक जाये ना एक झलक से ही हम,
काबू रखें ख़ुद पर कि वो ना जाने क्यू सँवर रहा होगा |

इकलौते हम ही नहीं है गहराईयों से वाबस्ता यहाँ,
ना जाने आँखों से होकर और किसमे गहरा उतर रहा होगा |

ख़ुद को रोकते हैं कि क्या पता आदमी अच्छे हैं भी या नहीं,
इस महफ़िल में है महान कई जिनका दिल पिंधल रहा होगा |

इकलौते मिले और सींचे हमें ऐसा हमारा क्या हक है,
आजाद बादल हैं वो जहाँ चाहे वहाँ बरस रहा होगा |

ख़ुद को रोकते हैं कि कहने वाला ये भी कोई नही,
क्यूँ रुकते हो इतना ‘चौधरी’ ये कैसे वो समझ रहा होगा |

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Khud ko rokte hain keh kr ye ke vo na yun machal raha hoga,
AKhir kyun kre pareshan usse vo yun kar raha hoga yun kar raha hoga|

Iklotte hum hi ek deep nahi jo roshan kre andheron ko,
Jaise jalte hai hum me vo unme kya pta koi jal rha hoga|

Khud ko rokte hain ki behek jaye na ek jhalak se hi hum,
Kaabu rakhen khud par ki vo na jane kyun sawar rha hoga|

Iklotte hum hi nahin hai geheraiyon se vaabasta yahan,
Na jane aankon se hokar orr kisme gehra utar rha hoga|

Khud ko rokte hain ki kya pta aadmi acche hain bhi ya nahin,
Iss mehfil mai hai mahan kayi jinka dil pinghal rha hoga|

Iklotte mille orr sinche hamein aisa hamara kya hak hai,
Aajad badal hain vo jahan chahe vahan baras rha hoga|

Khud ko rokte hain ki kehne vala ye bhi koi nahi,
Kyun rukte ho itna ‘Chaudhary’ ye kaise vo samajh rha hoga|

जब कभी दुनियाँ से उकता जाता है दिल / Jab kabhi duniya se ukta jata hai dil

Pen

जब कभी दुनियाँ से उकता जाता है दिल,
दिल को समझाता हूँ मैं और मुझ को समझाता है दिल|

वायदे, सितम, इंतजार, वो फरेब नज़र तौॅबा तौॅबा,
सुनते ही जिक्र मोहब्बत अब घबरा जाता है दिल|

हर नज़र मै खौफ़ है हर शय है सहमी हुई,
कली को खिलते देख कर अब मुरझा जाता है दिल|

बदल गए कानून भी अब मयकदे के साकिया,
जरा सी बूँद को भी अब तरस जाता है दिल|

इन्ँसा की जात पर ना जाने कैसा परदा गिर गया,
ज़र व जोरू के लिए अब तो बिक जाता है दिल|

बहुरंगी रोशनी में पथरा गयी नज़रें कुछ इस तरहां,
अब तो ग़रीब गिरेबांँ पाक को भी ठुकराता है दिल|

इन्ँसा के बदले जानवर की कीमत ‘रंगीला’ ज्यादा हो गई,
नासमझों के सजदे में अब ये झुक जाता है दिल ||

By A.S.Rangila


 

Jab kabhi duniya se ukta jata hai dil,
Dil ko samjhata hun main aur mujh ko samjhata hai dil|

Vayde, Sitam, intizār, Vo fareb nazar tauba tauba,
Sunte hi zikr mohabbat ab ghabra jata hai dil|

Har nazar mai khauf hai har shay hai sehmi hui,
Kali to khilte dekh kar ab murjha jata hai dil|

Badal gaye kanun bhi ab maykade ke sakiya,
Zara si bund ko bhi ab taras jata hai dil|

Insaan ki zaat par na jaane kaisa parda gie gya,
Zar ve Zoru ke liye ab to biik jata hai dil|

Bahurangi roshni main pathra gayi nazare kuch iss tarah,
Ab to gareeb geeraiban pak ko bhi thukrata hai dil|

Insan ke badle janvar ki keemat ‘Rangila’ jyada ho gyi,
Na-samjhon ke sajde main ab ye jhuk jata hai dil|

By A.S.Rangila

————- An Old Acquaintance of mine————–

बिन चोंट खाए इस दुनिया में क्या लोग नही जीते / Bin chonT khaye iss duniya mai kya log nahi jiite

Wheat-Beers-For-Picky-Drinkers

बिन चोंट खाए इस दुनिया में क्या लोग नही जीते,
जिनके ना हों कोई क़िस्से क्या ऐसे लोग नही पीते |

पियों यहाँ की मय-कदा सिर्फ़ दिलजलों का घर नहीं,
यहाँ इश्क़ से लबरेज़ भी हैं सिर्फ़ प्यासे नही पीते |

ये आग पानी से ना बुझी है ना बुझे गी साक़िया,
तो जाम-ए-तही मैं आग ही भर इसे आग ही जीतें |

नसीहत ना देकर तुम्हें सुधार लें हम ख़ुद को ही,
पर क्या फटी कमीज़ दर्जी औरों के सूट नही सीते |

हर खेल मै फ़ातेह और फ़त्ह की तलाश रहती है,
दिल ही का खेल है कि चलता रहै कोई हारे कोई जीतें |

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Bin chonT khaye iss duniya mai kya log nahi jiite.
Jinke na ho.n koii qisse kya aise log nahi piite |

Piyo.n yaha.n ki mai-kada sirF diljalo.n ka ghar nahi,
Yaha.n ishq se labrez bhi hai.n sirF pyase nahi piite |

Ye aag paani se na bujhi hai na bujhe gi saaqiyaa,
To jaam-e-tahii mai.n aag hi bhar isse aag hi jiite.n |

Nasiihat na dekar tumhe.n sudhar le.n hum Khud ko hi,
Par kya fati kamiiz darzi auro.n ke suit nahi siite |

Har khel mai faateh aur fat.h ki talaash rehti hai,
Dil hi ka khel hai ki chalta rahe koii haare koii jiite.n |

यारों और ना बेहाल करो मैं नशे में हूँ / Yaaro aur na behaal karo maiñ nashe meñ huuñ

Wobbling-Whiskey-Glass-Table

मीर तक़ी मीर और शाहिद कबीर को समर्पित…

….

यारों और ना बेहाल करो मैं नशे में हूँ,
बस अब बंद ये बवाल करो मैं नशे में हूँ |

कह रहाँ हूँ जो दास्तान-ए-इश्क़ तुम को,
यकीन करो या सवाल करो मैं नशे में हूँ |

जलाओ ये दीप उस के लिए तुम पर,
मेरी तरफ़ ना ये मशाल करो मैं नशे में हूँ |

बेपरवाह हूँ इन एहसासों को लेकर अब मैं,
इन्हें झटको या हलाल करो मैं नशे में हूँ |

हैं दुनिया में तस्‍व्वुरई के लिए लोग और भी,
मेरी अब ना यूँ मिसाल करो मैं नशे में हूँ |

रह सकता है जिंदा दरारों भरा इंसाँ कैसे कोई,
किसी सूफ़ी से ये सवाल करो मैं नशे में हूँ |

करते थे जो दीनियात के जलसे हम हर बार,
वो जलसे ना इस साल करो मैं नशे में हूँ |

इज़हार-ए-हक़ीक़त करने का ये दे ए’तिमाद,
इस मयकशी पर ना मलाल करो मैं नशे में हूँ |

हूँ किसी भी क़द्र-दानी के काबिल नहीं मैं,
किसी फ़ाज़िल शायर को निहाल करो मैं नशे में हूँ |

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…Dedicated to MIR TAQI MIR and SHAHID KABIR

….

Yaaro aur na behaal karo maiñ nashe meñ huuñ,
Bas ab bañd ye bawaal karo maiñ nashe meñ huuñ|

Keh rahā huuñ jo dāstān-e-ishq tum ko,
Yaqīīn karo ya savāl karo maiñ nashe meñ huuñ|

Jalāo ye deep uske liye tum par,
Merī taraf na ye mash.al karo maiñ nashe meñ huuñ|

Be-parvā huuñ iñ ehsāshoñ ko lekar ab maiñ,
Iñhe jhatko ya halāl karo maiñ nashe meñ huuñ|

Haiñ duniya meñ tasavvuri ke liye log aur bhi,
Merī ab na yuñ misāāl karo maiñ nashe meñ huuñ|

Reh sakta hai jinda darāroñ bhara insaa.n kaise koi,
Kisi sufi se ye savāl karo maiñ nashe meñ huuñ|

Karte the jo deeniyāt ke jalse hum har bar,
Vo jalse na iss saal karo maiñ nashe meñ huuñ|

Iz.hār-e-haqīqat karne ka ye de etimād,
Iss mai-kashī par na malāl karo maiñ nashe meñ huuñ|

Huuñ kisi bhi qadr-dānī ke qaabil nhi maiñ,
Kisi fāazil shayar ko nihāl karo maiñ nashe meñ huuñ|